जीने का कला

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'चरित्र, दांपत्य की पवित्रता आदि सामाजिक नियम, वाहनों की • एकतरफा यात्रा के समान हैं। अपने-अपने शरीर और मन के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए और समाज से टकराहट के बिना जीने के लिए ही सदाचार या चरित्र की ज़रूरत होती है। इस तरह का चरित्र स्त्री, पुरुष, बच्चे एवं बूढ़े सभी के लिए ज़रूरी होता है। इसे छोड़कर कारागार जैसे सुरक्षा से क्या लाभ हो सकता है? लोगों को स्वयं ही समझकर अपने चरित्र की रक्षा कर लेनी चाहिए। दांपत्य की पवित्रता केवल स्त्रियों के लिए नहीं है, पुरुषों के लिए भी है । तब तो चरित्र या सदाचार का सरल सूत्र यही बनता है, खुद को या दूसरों को वर्तमान में या बाद के समय में, शरीर को या मन को हानि पहुँचाए बिना अपने कार्यों को निभाना ही सदाचार है।" किसी से भी टकराए बिना सबसे स्नेहपूर्ण संबंध रखना हो तो आलोचना, आदेश, आग्रह इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

'सहन शक्ति, समझौता और त्याग भावना होने पर ही जीवन में यथार्थ आनंद प्राप्त होगा। दुनिया की वस्तुओं की दरिद्रता को दूर करने के लिए कई लोग कई तरह से प्रयासरत हैं। उनका प्रयास व्यर्थ का प्रयास ही जान पड़ता है। जब तक ज्ञान की दरिद्रता हटेगी नहीं, तब तक वस्तुओं की दरिद्रता दूर नहीं होगी। अपने लिए क्या चाहिए, उसके लिए क्या करना चाहिए, इसे पहचाने बिना स्वाभिमान खोकर हर चीज़ के लिए दूसरों का मोहताज होना भी ज्ञान की दरिद्रता ही है। जब तक प्रत्येक व्यक्ति इस ज्ञान को नहीं पाता तब तक किये जाने वाले सारे सुधार, कानून-कायदे, उपदेश, सेवाएँ सभी कुछ बेकार ही निकलेंगे। इसलिए प्रयत्नपूर्वक उस ज्ञान को प्राप्त करना हरेक व्यक्ति का कर्तव्य बनता है।